यक्षप्रश्नाः

महाभारत के तीसरे पर्व, वन पर्व, के अध्याय ३१३ में, ज्येष्ठ पांडव पुत्र युधिष्ठिर तथा, यक्ष रूप धारी, धर्मराज, युधिष्ठिर के पिता, के बीच एक वार्तालाप का वर्णन है। यक्ष प्रश्न पूछते हैं जिनके उत्तर युधिष्ठिर देते हैं। मनुष्य इन प्रश्नों और उत्तरों को समझ कर बड़ा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।


यक्ष उवाच ।
किं स्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितश्चराः ।
कश्चैनमस्तं नयति कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति ॥ ४५॥
युधिष्ठिर उवाच ।
ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितश्चराः ।
धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ॥ ४६॥
संख्या संस्कृत हिंदी
१ प्र किं स्विदादित्यमुन्नयति कौन सूरज को ऊपर उठाता है (सूर्योदय करता है)?
१ उ ब्रह्मादित्यमुन्नयति ब्रह्म सूरज को ऊपर उठाता है (सूर्योदय करता है)।
२ प्र के च तस्याभितश्चराः उसके (सूरज के) चारों ओर कौन चलता है?
२ उ देवास्तस्याभितश्चराः देवता उसके चारों ओर चलते हैं।
३ प्र कश्चैनमस्तं नयति उसे (सूरज को) अस्त कौन करता है?
३ उ धर्मश्चास्तं नयति धर्म उसे अस्त करता हैं।
४ प्र कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति और,वह किसमें प्रतिष्ठित है?
४ उ च सत्ये च प्रतितिष्ठति और वह सत्य में प्रतिष्ठित है।

यक्ष उवाच ।
केनस्विच्छ्रोत्रियो भवति केनस्विद्विन्दते महत् ।
केनस्विद्द्वितीयवान्भवति राजन्केन च बुद्धिमान् ॥ ४७॥
युधिष्ठिर उवाच ।
श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत् ।
धृत्या द्वितीयवान्भवति बुद्धिमान्वृद्धसेवया ॥ ४८॥
संख्या संस्कृत हिंदी
५ प्र केनस्विद् श्रोत्रियो भवति मनुष्य सुनने योग्य कैसे होता (बनता) है?
५ उ श्रुतेन श्रोत्रियो भवति वेदों के अध्ययन से मनुष्य सुनने योग्य होता है।
६ प्र केनस्विद् महत् विन्दते मनुष्य श्रेष्ठता कैसे प्राप्त करता है?
६ उ तपसा महत् विन्दते मनुष्य तप कर के श्रेष्ठता प्राप्त करता है।
७ प्र केनस्विद् द्वितीयवान् भवति राजन् राजन, मनुष्य को किसके द्वारा (होने से) लगता है कि कोई मित्र साथ में है?
७ उ धृत्या द्वितीयवान् भवति धैर्य है तो लगता है कि कोई मित्र साथ में है।
८ प्र केन च बुद्धिमान् (भवति) मनुष्य बुद्धिमान कैसे होता है?
८ उ वृद्धसेवया बुद्धिमान् (भवति) वृद्ध जनों की सेवा से मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है।

यक्ष उवाच ।
किं ब्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव ।
कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥ ४९॥
युधिष्ठिर उवाच ।
स्वाध्याय एषां देवत्वं तप एषां सतामिव ।
मरणं मानुषो भावः परिवादोऽसतामिव ॥ ५०॥
संख्या संस्कृत हिंदी
९ प्र किं ब्राह्मणानां देवत्वं ब्राह्मणों में देवत्व 1 क्या है (ब्राह्मण देवत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं)?
९ उ स्वाध्याय एषां देवत्वं स्वाध्याय 2 (परम ज्ञान प्राप्त कर) से ही ब्राह्मण देवत्व प्राप्त कर सकते है।
१० प्र कः च धर्मः सताम् इव और,(ब्राह्मणों में) सत पुरुषों के जैसा धर्म क्या है?
१० उ तप एषां सताम् इव तप ब्राह्मणों में सत पुरुषों के जैसा धर्म है।
११ प्र कः च एषाम् मानुषो भावः ब्राह्मणों का मानवीय गुण क्या है?
११ उ मरणं मानुषो भावः मरना ब्राह्मणों का मानवीय गुण है।
१२ प्र किम् एषाम् असताम् इव उन (ब्राह्मणों) में असत्पुरुषों का-सा आचरण क्या है (ब्राह्मण के लिए गलत मार्ग क्या है)?
१२ उ परिवादोऽसतामिव निन्दा करना असत्पुरुषों का-सा आचरण अथवा गलत मार्ग है।
1. देवत्व का अर्थ गुण, कर्म और स्वभाव, इन तीनों की श्रेष्ठता से है ।
2. स्वाध्याय शब्द का अर्थ 'स्वयं अध्ययन करना' है । लेकिन संस्कृत काव्य में, यह एक वृहद संकल्पना है जिसके अनेक अर्थ होते हैं। विभिन्न हिन्दू दर्शनों में स्वाध्याय एक 'नियम' है। मान सकते हैं की इस श्लोक में स्वाध्याय का अर्थ वेद एवं अन्य ग्रंथों से  ज्ञान प्राप्त कर स्वयं को जानना है। इस विषय पर और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इस ब्लॉग से बाहर का एक लेख पढ़ें .

यक्ष उवाच ।
किं क्षत्रियाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव ।
कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥ ५१॥
युधिष्ठिर उवाच ।
इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव ।
भयं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ॥ ५२॥
संख्या संस्कृत हिंदी
१३ प्र किं क्षत्रियाणां देवत्वं क्षत्रियों में देवत्व क्या है (क्षत्रिय देवत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं)?
१३ उ इष्वस्त्रम् एषां देवत्वं बाणविद्या क्षत्रियों का देवत्व है (क्षत्रिय अपने हथियारों में महारत हासिल कर देवत्व प्राप्त करते हैं)।
१४ प्र कः च धर्मः सताम् इव और,(क्षत्रियों में) सत पुरुषों के जैसा धर्म क्या है?
१४ उ यज्ञ एषां सताम् इव यज्ञ3 क्षत्रियों में सत पुरुषों के जैसा धर्म है।
१५ प्र कः च एषाम् मानुषो भावः क्षत्रियों का मानवीय गुण क्या है?
१५ उ भयं वै मानुषो भावः भय (डर) एक क्षत्रिय का मानवीय गुण है।
१६ प्र किम् एषाम् असताम् इव उन (क्षत्रियों) में असत्पुरुषों का-सा आचरण क्या है? (क्षत्रिय के लिए गलत मार्ग क्या है?)
१६ उ परित्यागोऽसतामिव शरण में आये हुए दु:खियों का परित्याग कर देना गलत मार्ग है /असत्पुरुषों के जैसा आचरण है.
3. ज्ञान प्राप्ति के लिए किये गए सर्व कार्य यज्ञ हैं। यज्ञ का अर्थ गीता के अध्याय ४ में भगवान श्रीकृष्ण ने समझाया है।

यक्ष उवाच ।
किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजुः ।
का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५३॥
युधिष्ठिर उवाच ।
प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजुः ।
ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५४॥
संख्या संस्कृत हिंदी
१७ प्र किमेकं यज्ञियं साम कौन सी एक वस्तु यज्ञ का गान है?
१७ उ प्राणो वै यज्ञियं साम प्राण ही यज्ञ का गान है ।
१८ प्र किमेकं यज्ञियं यजुः कौन सी एक वस्तु यज्ञ में समर्पण योग्य है?
१८ उ मनो वै यज्ञियं यजुः मन यज्ञ में समर्पण योग्य है।
१९ प्र का चैषां वृणुते यज्ञंः कौन सी एक वस्तु यज्ञ का वरण करती है (यज्ञ किस पर टिका है)?
१९ उ ऋक् एका वृणुते यज्ञं ऋक् (स्तुति) पर यज्ञ टिका है।
२० प्र कां यज्ञो नातिवर्तते वह क्या है, जो यज्ञ का उल्लंघन नहीं करता है?
२० उ तां यज्ञो नातिवर्तते वही (ऋक्/स्तुति) यज्ञ का उल्लंघन नहीं करती है।
४ . ५ . ६.
अपूर्ण। ....