यक्षप्रश्नाः

महाभारत के तीसरे पर्व, वन पर्व, के अध्याय ३१३ में, ज्येष्ठ पांडव पुत्र युधिष्ठिर तथा, यक्ष रूप धारी, धर्मराज, युधिष्ठिर के पिता, के बीच एक वार्तालाप का वर्णन है। यक्ष प्रश्न पूछते हैं जिनके उत्तर युधिष्ठिर देते हैं। मनुष्य इन प्रश्नों और उत्तरों को समझ कर बड़ा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।


यक्ष उवाच ।
किं स्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितश्चराः ।
कश्चैनमस्तं नयति कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति ॥ ४५॥
युधिष्ठिर उवाच ।
ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितश्चराः ।
धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ॥ ४६॥
संख्या संस्कृत हिंदी
१ प्र किं स्विदादित्यमुन्नयति कौन सूरज को ऊपर उठाता है (सूर्योदय करता है)?
१ उ ब्रह्मादित्यमुन्नयति ब्रह्म सूरज को ऊपर उठाता है (सूर्योदय करता है)।
२ प्र के च तस्याभितश्चराः उसके (सूरज के) चारों ओर कौन चलता है?
२ उ देवास्तस्याभितश्चराः देवता उसके चारों ओर चलते हैं।
३ प्र कश्चैनमस्तं नयति उसे (सूरज को) अस्त कौन करता है?
३ उ धर्मश्चास्तं नयति धर्म उसे अस्त करता हैं।
४ प्र कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति और,वह किसमें प्रतिष्ठित है?
४ उ च सत्ये च प्रतितिष्ठति और वह सत्य में प्रतिष्ठित है।

यक्ष उवाच ।
केनस्विच्छ्रोत्रियो भवति केनस्विद्विन्दते महत् ।
केनस्विद्द्वितीयवान्भवति राजन्केन च बुद्धिमान् ॥ ४७॥
युधिष्ठिर उवाच ।
श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत् ।
धृत्या द्वितीयवान्भवति बुद्धिमान्वृद्धसेवया ॥ ४८॥
संख्या संस्कृत हिंदी
५ प्र केनस्विद् श्रोत्रियो भवति मनुष्य सुनने योग्य कैसे होता (बनता) है?
५ उ श्रुतेन श्रोत्रियो भवति वेदों के अध्ययन से मनुष्य सुनने योग्य होता है।
६ प्र केनस्विद् महत् विन्दते मनुष्य श्रेष्ठता कैसे प्राप्त करता है?
६ उ तपसा महत् विन्दते मनुष्य तप कर के श्रेष्ठता प्राप्त करता है।
७ प्र केनस्विद् द्वितीयवान् भवति राजन् राजन, मनुष्य को किसके द्वारा (होने से) लगता है कि कोई मित्र साथ में है?
७ उ धृत्या द्वितीयवान् भवति धैर्य है तो लगता है कि कोई मित्र साथ में है।
८ प्र केन च बुद्धिमान् (भवति) मनुष्य बुद्धिमान कैसे होता है?
८ उ वृद्धसेवया बुद्धिमान् (भवति) वृद्ध जनों की सेवा से मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है।

यक्ष उवाच ।
किं ब्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव ।
कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥ ४९॥
युधिष्ठिर उवाच ।
स्वाध्याय एषां देवत्वं तप एषां सतामिव ।
मरणं मानुषो भावः परिवादोऽसतामिव ॥ ५०॥
संख्या संस्कृत हिंदी
९ प्र किं ब्राह्मणानां देवत्वं ब्राह्मणों में देवत्व 1 क्या है (ब्राह्मण देवत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं)?
९ उ स्वाध्याय एषां देवत्वं स्वाध्याय 2 (परम ज्ञान प्राप्त कर) से ही ब्राह्मण देवत्व प्राप्त कर सकते है।
१० प्र कः च धर्मः सताम् इव और,(ब्राह्मणों में) सत पुरुषों के जैसा धर्म क्या है?
१० उ तप एषां सताम् इव तप ब्राह्मणों में सत पुरुषों के जैसा धर्म है।
११ प्र कः च एषाम् मानुषो भावः ब्राह्मणों का मानवीय गुण क्या है?
११ उ मरणं मानुषो भावः मरना ब्राह्मणों का मानवीय गुण है।
१२ प्र किम् एषाम् असताम् इव उन (ब्राह्मणों) में असत्पुरुषों का-सा आचरण क्या है (ब्राह्मण के लिए गलत मार्ग क्या है)?
१२ उ परिवादोऽसतामिव निन्दा करना असत्पुरुषों का-सा आचरण अथवा गलत मार्ग है।
1. देवत्व का अर्थ गुण, कर्म और स्वभाव, इन तीनों की श्रेष्ठता से है ।
2. स्वाध्याय शब्द का अर्थ 'स्वयं अध्ययन करना' है । लेकिन संस्कृत काव्य में, यह एक वृहद संकल्पना है जिसके अनेक अर्थ होते हैं। विभिन्न हिन्दू दर्शनों में स्वाध्याय एक 'नियम' है। मान सकते हैं की इस श्लोक में स्वाध्याय का अर्थ वेद एवं अन्य ग्रंथों से  ज्ञान प्राप्त कर स्वयं को जानना है। इस विषय पर और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इस ब्लॉग से बाहर का एक लेख पढ़ें .

यक्ष उवाच ।
किं क्षत्रियाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव ।
कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥ ५१॥
युधिष्ठिर उवाच ।
इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव ।
भयं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ॥ ५२॥
संख्या संस्कृत हिंदी
१३ प्र किं क्षत्रियाणां देवत्वं क्षत्रियों में देवत्व क्या है (क्षत्रिय देवत्व कैसे प्राप्त कर सकते हैं)?
१३ उ इष्वस्त्रम् एषां देवत्वं बाणविद्या क्षत्रियों का देवत्व है (क्षत्रिय अपने हथियारों में महारत हासिल कर देवत्व प्राप्त करते हैं)।
१४ प्र कः च धर्मः सताम् इव और,(क्षत्रियों में) सत पुरुषों के जैसा धर्म क्या है?
१४ उ यज्ञ एषां सताम् इव यज्ञ3 क्षत्रियों में सत पुरुषों के जैसा धर्म है।
१५ प्र कः च एषाम् मानुषो भावः क्षत्रियों का मानवीय गुण क्या है?
१५ उ भयं वै मानुषो भावः भय (डर) एक क्षत्रिय का मानवीय गुण है।
१६ प्र किम् एषाम् असताम् इव उन (क्षत्रियों) में असत्पुरुषों का-सा आचरण क्या है? (क्षत्रिय के लिए गलत मार्ग क्या है?)
१६ उ परित्यागोऽसतामिव शरण में आये हुए दु:खियों का परित्याग कर देना गलत मार्ग है /असत्पुरुषों के जैसा आचरण है.
3. ज्ञान प्राप्ति के लिए किये गए सर्व कार्य यज्ञ हैं। यज्ञ का अर्थ गीता के अध्याय ४ में भगवान श्रीकृष्ण ने समझाया है।

यक्ष उवाच ।
किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजुः ।
का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५३॥
युधिष्ठिर उवाच ।
प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजुः ।
ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५४॥
संख्या संस्कृत हिंदी
१७ प्र किमेकं यज्ञियं साम कौन सी एक वस्तु यज्ञ का गान है?
१७ उ प्राणो वै यज्ञियं साम प्राण ही यज्ञ का गान है ।
१८ प्र किमेकं यज्ञियं यजुः कौन सी एक वस्तु यज्ञ में समर्पण योग्य है?
१८ उ मनो वै यज्ञियं यजुः मन यज्ञ में समर्पण योग्य है।
१९ प्र का चैषां वृणुते यज्ञंः कौन सी एक वस्तु यज्ञ का वरण करती है (यज्ञ किस पर टिका है)?
१९ उ ऋक् एका वृणुते यज्ञं ऋक् (स्तुति) पर यज्ञ टिका है।
२० प्र कां यज्ञो नातिवर्तते वह क्या है, जो यज्ञ का उल्लंघन नहीं करता है?
२० उ तां यज्ञो नातिवर्तते वही (ऋक्/स्तुति) यज्ञ का उल्लंघन नहीं करती है।
४ . ५ . ६.
अपूर्ण। ....

शिव ताण्डव स्तोत्र

(शिवताण्डवस्तोत्रम्)

शिव ताण्डव स्तोत्र शिवभक्त लंकाधिपति रावण द्वारा रचित भगवान शिव का स्तोत्र है। यह पंचचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी भाषा अनुप्रास अलंकार और समास के प्रयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।

  • अलंकार के अर्थ होता है आभूषण। अलंकार हिंदी और संस्कृत भाषा की सुंदरता बढ़ाने का कार्य करते हैं। अनुप्रास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है ,अनु + प्रास | यहाँ पर अनु का अर्थ है "बार-बार" और प्रास का अर्थ है "वर्ण"। जब किसी वर्ण की बार-बार आवर्ती ( दोहराया गया) हो तो उसे अनुप्रास अलंकार कहते है। उदाहरण - जन रंजन मंजन दनुज मनुज रूप सुर भूप। विश्व बदर इव धृत उदर जोवत सोवत सूप।। 
  • समास का शाब्दिक अर्थ होता है छोटा रूप। लेखन में इसका अर्थ संछिप्तीकरण से है । दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर जो नया और छोटा शब्द बनता है उस शब्द को समास कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जहाँ पर कम-से-कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ को प्रकट किया जाए वह समास कहलाता है।
पंचचामर छन्द 
यह छंद  चार चरण का वर्णिक छंद है जिसके प्रत्येक चरण में लघु गुरु के क्रम से सोलह वर्ण होते हैं।
(12       12       12      12      12      12      12      12   )

उदाहरण 
सुकोमली सुहागिनी प्रिया पुकारती रही।
अनामिका विहारिणी हिया विचारती रही।।
सुगंध ले खिली हुई कली निहारती रही।
दुलारती रही निशा दिशा सँवारती रही।।-1
बहार बाग मोरिनी कुलांच मारती रही।
मतंग मंद मालती सुगंध छाँटती रही।।
लुभा गए अनेक गुंज कुंज ताकती रही।
उड़ान के विचार में पतंग सारती रही।।-2
महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी


जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥1॥
जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजंग-तुंग-मालिकाम्  डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् ॥१॥
अर्थात- जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित होकर गंगा जी की धाराएं उनके कंठ को प्रक्षालित होती हैं, जिनके गले में बड़े एवं लंबे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्यान करें.

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
जटा-कटा-हसं-भ्रमभ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी- -विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि . धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥
अर्थात- जिन शिव जी के जटाओं में अतिवेग से विलास पूर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे उनके शिश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाएं धधक-धधक करके प्रज्जवलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढ़ता रहे.

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
धरा-धरेन्द्र-नंदिनीविलास-बन्धु-बन्धुर स्फुर-द्दिगन्त-सन्तति प्रमोद-मान-मानसे . कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
अर्थात- जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणिय कटाक्षों में परम आनंदित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनके कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र समान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनंदित रहे.

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥4॥
जटा-भुजंग-पिंगल-स्फुरत्फणा-मणिप्रभा कदम्ब-कुंकुम-द्रवप्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे  मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि ॥४॥
अर्थात- मैं उन शिव जी की भक्ति में आनंदित रहूं जो सभी प्राणियों के आधार एवं रक्षक हैं, जिनकी जाटाओं में लिपटे सर्पों के फन की मणियों का पीले वर्ण प्रभा-समुह रूप केसर प्रकाश सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है और जो गजचर्म (हिरण की छाल) से विभुषित हैं.

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥5॥
सहस्रलोचनप्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सरांघ्रि-पीठभूः  भुजंगराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक: श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ॥५॥
अर्थात- जिन शिव जी के चरण इन्द्रादि देवताओं के मस्तक के फूलों की धूल से रंजित हैं (जिन्हें देवतागण अपने सर के फूल अर्पण करते हैं), जिनकी जटा पर लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें.

ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥6॥
ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनंजय-स्फुलिंगभा- निपीत-पंच-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्  सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः ॥६॥
अर्थात- जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभी देवों द्वारा पूज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्धि प्रदान करें.

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥7॥
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल द्धनंज-याहुतीकृत-प्रचण्डपंच-सायके  धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक -प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम ॥७॥
अर्थात- जिनके मस्तक से निकली प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव, पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर है (यहां पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो.

वीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
वीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत् कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः  निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥
अर्थात- जिनका कण्ठ नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के समान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें.

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
प्रफुल्ल-नीलपंकज-प्रपंच-कालिमप्रभा- -वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् . स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे ॥९॥
अर्थात- जिनका कण्ठ और कंधा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुंदर श्याम प्रभा से विभूषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दु:खों को काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अंधकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूं.

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥
अखर्वसर्व-मंग-लाकला-कदंबमंजरी रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम् . स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥
अर्थात- जो कल्यानमय, अविनाशी, समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अंधकासुर के सहांरक, दक्ष यज्ञ विध्वंसक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूं.

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजंग-मश्वस- द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट् धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंग-तुंग-मंगल ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥
अर्थात- अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढ़ी हूई प्रचण्ड अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं.

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकमस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुह्रद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥
दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजंग-मौक्ति-कस्रजोर् -गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः . तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
अर्थात- कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टुकडों, शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर सामान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूं.

कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥
कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुंज-कोटरे वसन् विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मंजलिं वहन् . विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः शिवेति मंत्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
अर्थात- कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करते हुए, निष्कपट हो, सिर पर अंजली धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा.

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
अर्थात- देवांगनाओं के सिर में गूंथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएं परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें.

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना। विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥
अर्थात- प्रचण्ड बड़वानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएं.

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥16॥
इमम ही नित्यमेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम् . हरे गुरौ सुभक्तिमा शुयातिना न्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
अर्थात- इस उत्त्मोत्त्म शिव ताण्डव स्त्रोत को नित्य पढ़ने या सुनने मात्र से प्राणी पवित्र हो, परमगुरू शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है.

पूजावसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे . तस्य स्थिरां रथ गजेन्द्र तुरंग युक्तां लक्ष्मीं सदैवसुमुखिं प्रददाति शंभुः ॥१७॥
अर्थात- प्रात: शिवपुजन के अंत में इस रावणकृत शिव ताण्डव स्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़ा आदि संपदा से सर्वदा युक्त रहता है.

॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

॥ श्री रुद्राष्टकम् ॥

पहले रुद्राष्टकम् स्तोत्र के विषय में कुछ जानकारी।


  • यह स्तोत्र गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया है । 
  • इसका उल्लेख श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में आता है। 
  • इसे जगती छंद में लिखा गया है | इसमें प्रत्येक छंद चार पदों का होता है। हर पद  में १२/१२ वर्ण होते हैं। इस प्रकार, हर छंद में ४८ वर्ण होते हैं। 

छंदों के विषय में कुछ जानकारी।


  • वैदिक छंद वेदों के मंत्रों में प्रयुक्त कवित्त मापों को कहा जाता है। श्लोकों में मात्राओं की संख्या और उनके लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों के समूहों को छंद कहते हैं - वेदों में कम से कम १५ प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं। 
  • उदाहरण के लिए, गायत्री छंद इनमें सबसे प्रसिद्ध है जिसके नाम ही एक मंत्र का नाम गायत्री मंत्र पड़ा है।इसमें कुल तीन पाद अथवा चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में ८ वर्ण होते हैं। कुल मिलाकर २४ वर्ण होते हैं।





    श्रीरुद्राष्टकम् - श्री गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित

    नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
    विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
    चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥
    निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
    गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
    करालं महाकालकालं कृपालं
    गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥
    तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
    मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
    स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
    लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥

    चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
    प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
    मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
    प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥

    प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
    अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
    त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
    भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥

    कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
    सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
    चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
    प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥

    न यावद् उमानाथपादारविन्दं
    भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
    न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
    प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥७॥

    न जानामि योगं जपं नैव पूजां
    नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
    जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
    प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥८॥

    रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये
    ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥

    इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ।

    हिंदी में भावार्थ


    नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
    विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
    चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥
    नमामी ईशम् ईशान निर्वाण रुपम्
    देव(मैं) नमस्कार करता हूँ शिवजी का नाम मोक्ष स्वरुप
    मोक्ष स्वरुप शिवजी को मैं नमस्कार करता हूँ
    विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेद स्वरूपम्
    विद्यमान हर जगह ब्रह्म को जानने वाला रूप में
    जो सर्वत्र विद्यमान हैं और ब्रह्म को जानने वाले रूप में हैं
    निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्
    सत्य गुण अवगुण से परे जिनका कोई विकल्प नहीं इच्छाओं/कामनाओं से अछूते
    जो सत्य का प्रतीक हैं, गुण अवगुण से परे हैं, कामनाओं से अछूते हैं
    चित् आकाशम् आकाशवासं भजेऽहम्
    चेतना आकाश आकाश में रहने वाले आपका मैं भजन करता हूँ
    चेतनरूपी आकाश के समान और आकाश में रहने वाले आपका मैं भजन करता हूँ
    निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
    गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
    करालं महाकालकालं कृपालं
    गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥
    निराकारम् ओंकार मूलम् तुरीयम्
    आकार रहित (ॐ )परब्रह्म का चिन्ह आधार (जड़) तुरीय अवस्था में रहने वाला
    श्री रुद्र को प्रणाम) जो निराकार है, ओंकार का आधार हैं और जिन्हे तुरीय अवस्था में प्राप्त किया जाता है।
    गिरा ज्ञान गोतीत ईशम् गिरीशम् ।
    दिखाई देने वाले हर जगह जो सर्वत्र विद्यमान है ब्रह्म को जानने वाला
    जो सर्वत्र विद्यमान हैं और ब्रह्म को जानने वाले रूप में हैं
    निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्
    सत्य गुण अवगुण से परे जिनका कोई विकल्प नहीं इच्छाओं/कामनाओं से अछूते
    जो सत्य का प्रतीक हैं, गुण अवगुण से परे हैं, कामनाओं से अछूते हैं
    चित् आकाशम् आकाशवासं भजेऽहम्
    चेतना आकाश आकाश में रहने वाले आपका मैं भजन करता हूँ
    चेतनरूपी आकाश के समान और आकाश में रहने वाले आपका मैं भजन करता हूँ
    १. ध्यान की चौथी अवस्था जिस में ब्रम्ह अनुभव किया जाता है।

    श्लोक पाँच Verse 5

    पदच्छेद:

    धृष्टकेतुः, चेकितानः, काशिराजः, च, वीर्यवान्,
    पुरुजित्, कुन्तिभोजः, च, शैब्यः, च, नरपुङ्गवः।।5।।

    धृष्टकेतुः (धृष्टकेतु, शिशुपाल का पुत्र था और चेदी देश क राजा), चेकितानः (राजा धृष्टकेतु का पुत्र और केकय देश का राजकुमार)  , काशिराजः( प्राचीन समय में काशी1पर शासन करने वाले शासक को 'काशीराज' कहा जाता था ), च, वीर्यवान् (बलवान, काशिराज के लिए कहा गया है),


    पुरुजित् (कुंतिभोज का पुत्र, पाण्डवों की माता कुंती का भाई, अर्जुन का मामा), कुन्तिभोजः( पाण्डवों की माता कुंती के पालक पिता ), च (और), शैब्यः (शिबि राजा का पुत्र, काशिराज का पुत्र), च, नरपुङ्गवः (नरों में श्रेष्ट)।।5।। 






    ‘काशी’
    • पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक। वाराणसी का दूसरा नाम ‘काशी’ प्राचीन काल में एक जनपद के रूप में प्रख्यात था और वाराणसी उसकी राजधानी थी।
    • इसकी पुष्टि पाँचवीं शताब्दी में भारत आने वाले चीनी यात्री फ़ाह्यान के यात्रा विवरण से भी होती है।
    • हरिवंशपुराण में उल्लेख आया है कि ‘काशी’ को बसाने वाले पुरुरवा के वंशज राजा ‘काश’ थे। अत: उनके वंशज ‘काशि’ कहलाए।संभव है इसके आधार पर ही इस जनपद का नाम ‘काशी’ पड़ा हो
    'कुंतिभोज' 
    • पाण्डवों की माता कुंती के पालक पिता थे। कुंती के पिता राजा शूरसेन ने अपनी कन्या 'पृथा' (कुंती) को दान स्वरूप कुंतीभोज को सौंप दिया था, इसीलिए पृथा को 'कुंती' कहा गया।
    • कुंतीभोज के पिता का नाम 'भीम' था और इनके दो पुत्र 'धृष्ट' तथा 'अनाधृष्ट' हुए थे।
    • कुंती के वास्तविक पिता शूर की भाँति कुंतिभोज भी यदुवंशी थे।









    श्लोक चार Verse 4

    पदच्छेद:

    अत्र, शूराः, महेष्वासाः, भीमार्जुनसमाः, युधि,
    युयुधानः, विराटः, च, द्रुपद:, च, महारथः।।4।।

    अत्र (यहाँ, इस सेना में), शूराः(कई शूरवीर), महेष्वासाः (इष्वास अर्थात् धनुष , बड़े बड़े धनुष धारी), भीमार्जुनसमाः (भीम और अर्जुन से समान), युधि (युद्ध में),
    युयुधानः( सत्यकि) , विराटः (विराट), च (तथा), द्रुपद: (राजा द्रुपद) , च (तथा), महारथः (महारथी)।।4।।

    Here, in this army are many knights (men of valor), greatly skilled bowmen, who possess abilities like Bhim and Arjun in the battle field; great warriors like Satyaki , Virat and Drupada.

    इस श्लोक में जिन महारथियों के नाम लिए गए हैं, उनके बारे में अतिरिक्त जानकारी।

    युयुधानः   सत्यकि यादवों के एक कुल का राजकुमार, वासुदेव कृष्ण का अभिन्न मित्र एवं महाभारत के समय पाण्डवों की ओर से लडने वाला एक योद्धा था। वह उन चंद लोंगों में से था जो कि महाभारत के बाद जीवित बच गए थे। युयुधान अर्जुन से अस्त्रशस्त्र की विद्या सीखी थी। इसलिये भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा दुर्योधन को नारायणी सेना देने पर भी वह कृतज्ञ होकर अर्जुन के पक्ष में ही रहा, दुर्योधन के पक्ष में नहीं गया। कुछ आचार्यों का मत है कि द्रोणाचार्य के मन में अर्जुन के प्रति द्वेषभाव पैदा करने के लिये दुर्योधन महारथियों में सबसे पहले अर्जुन के शिष्य युयुधान का नाम लेता हैं। जैसे कह रहा हो, इस अर्जुनको तो देखिये, (यूयुधान से) कितना गिरा हुआ है। इसने आपसे ही अस्त्रशस्त्र चलाना सीखा है और आपने अर्जुनको यह वरदान भी दिया है कि आप प्रयास करेंगे की संसार में इसके समान और कोई धनुर्धर न हो। आपने तो अपने शिष्य अर्जुनपर इतना स्नेह रखा है पर वह कृतघ्न होकर आपके विपक्ष में लड़नेके लिये खड़ा है जबकि उसी अर्जुन का शिष्य, युयुधान, उसी के पक्ष में खड़ा है।
    युयुधान महाभारत के युद्ध में न मरकर, गांधारी के श्राप के फलस्वरूप, ३६ वर्षों बाद यादवों के आपसी युद्धमें मारे गये।



    श्लोक तीन Verse 3

    पदच्छेद:
    पश्य, एताम्, पाण्डुपुत्राणाम्, आचार्य, महतीम्, चमूम्,
    व्यूढाम्,  द्रुपदपुत्रेण , तव, शिष्येण, धीमता।।3।।


    Hey Acharya (teacher), look at this great army of Pandavas, which is so expertly arranged in a military formation by, your wise disciple, the son of Drupada ( Dhrstadyumna).

    श्लोक दो Verse 2

    पदच्छेद:

    (संजय उवाच)
    दृष्टा तु, पाण्डवानीकम्, व्यूढम्, दुर्योधनः, तदा,
    आचार्यम्, उपसंगम्य, राजा, वचनम्, अब्रवीत्।।2।।

    (Sanjay said)

    Noticing the military formation of Pandavas army, King Duryodhana went to his teacher (Guru Dronacharya) and expressed the following.