पहले रुद्राष्टकम् स्तोत्र के विषय में कुछ जानकारी।
- यह स्तोत्र गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया है ।
- इसका उल्लेख श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में आता है।
- इसे जगती छंद में लिखा गया है | इसमें प्रत्येक छंद चार पदों का होता है। हर पद में १२/१२ वर्ण होते हैं। इस प्रकार, हर छंद में ४८ वर्ण होते हैं।
छंदों के विषय में कुछ जानकारी।
- वैदिक छंद वेदों के मंत्रों में प्रयुक्त कवित्त मापों को कहा जाता है। श्लोकों में मात्राओं की संख्या और उनके लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों के समूहों को छंद कहते हैं - वेदों में कम से कम १५ प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं।
- उदाहरण के लिए, गायत्री छंद इनमें सबसे प्रसिद्ध है जिसके नाम ही एक मंत्र का नाम गायत्री मंत्र पड़ा है।इसमें कुल तीन पाद अथवा चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में ८ वर्ण होते हैं। कुल मिलाकर २४ वर्ण होते हैं।
श्रीरुद्राष्टकम् - श्री गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित
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नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥ |
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निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥ |
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तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् । स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥ |
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चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥ |
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प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं । त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥ |
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कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी । चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥ |
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न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥७॥ |
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न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् । जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥८॥ |
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रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥ |
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इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् । |
हिंदी में भावार्थ
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नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥ |
| नमामी ईशम् | ईशान | निर्वाण | रुपम् | |
| देव(मैं) नमस्कार करता हूँ | शिवजी का नाम | मोक्ष | स्वरुप | |
| मोक्ष स्वरुप शिवजी को मैं नमस्कार करता हूँ | ||||
| विभुम् | व्यापकम् | ब्रह्मवेद | स्वरूपम् | |
| विद्यमान | हर जगह | ब्रह्म को जानने वाला | रूप में | |
| जो सर्वत्र विद्यमान हैं और ब्रह्म को जानने वाले रूप में हैं | ||||
| निजम् | निर्गुणम् | निर्विकल्पम् | निरीहम् | |
| सत्य | गुण अवगुण से परे | जिनका कोई विकल्प नहीं | इच्छाओं/कामनाओं से अछूते | |
| जो सत्य का प्रतीक हैं, गुण अवगुण से परे हैं, कामनाओं से अछूते हैं | ||||
| चित् | आकाशम् | आकाशवासं | भजेऽहम् | |
| चेतना | आकाश | आकाश में रहने वाले | आपका मैं भजन करता हूँ | |
| चेतनरूपी आकाश के समान और आकाश में रहने वाले आपका मैं भजन करता हूँ | ||||
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निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥ |
| निराकारम् | ओंकार | मूलम् | तुरीयम् |
| आकार रहित | (ॐ )परब्रह्म का चिन्ह | आधार (जड़) | तुरीय१ अवस्था में रहने वाला |
| श्री रुद्र को प्रणाम) जो निराकार है, ओंकार का आधार हैं और जिन्हे तुरीय अवस्था में प्राप्त किया जाता है। | |||
| गिरा ज्ञान | गोतीत | ईशम् | गिरीशम् । |
| दिखाई देने वाले | हर जगह | जो सर्वत्र विद्यमान है | ब्रह्म को जानने वाला |
| जो सर्वत्र विद्यमान हैं और ब्रह्म को जानने वाले रूप में हैं | |||
| निजम् | निर्गुणम् | निर्विकल्पम् | निरीहम् |
| सत्य | गुण अवगुण से परे | जिनका कोई विकल्प नहीं | इच्छाओं/कामनाओं से अछूते |
| जो सत्य का प्रतीक हैं, गुण अवगुण से परे हैं, कामनाओं से अछूते हैं | |||
| चित् | आकाशम् | आकाशवासं | भजेऽहम् |
| चेतना | आकाश | आकाश में रहने वाले | आपका मैं भजन करता हूँ |
| चेतनरूपी आकाश के समान और आकाश में रहने वाले आपका मैं भजन करता हूँ | |||
१. ध्यान की चौथी अवस्था जिस में ब्रम्ह अनुभव किया जाता है।